चुनाव के दौरान मुस्लिम समुदाय का समर्थन प्राप्त करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते। यहाँ तो हद ही पार हो गयी। ऐसा लगा कि निकट भविष्य में किसी भी समुदाय विशेष का समर्थन प्राप्त करने के लिए लोग अपनी पहचान भी बदलने को तैयार हैं। दिनांक १ अप्रैल २०१४ को दैनिक भास्कर के नई दिल्ली राष्ट्रीय संस्करण के चौथे पृष्ठ में प्रकाशित इस समाचार को पढ़ कर मुझे बहुत हँसी आयी और थोड़ा कष्ट भी हुआ। राजनीती शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान श्री योगेन्द्र यादव जी के विषय में यह पढ़ना अत्यंत ही हास्यास्पद था कि उन्होंने किसी जनसभा में स्वयं का नाम 'सलीम' और अपनी बहन का नाम 'नज़मा' बता डाला। पहले भी लोगों के नाम के साथ किसी उपाधि स्वरुप कई संज्ञाओं को सुना है परन्तु मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए अपना नाम ही बदल लेना यह बात तो हज़म होने लायक नहीं है। अब इनके जैसे प्रखर वक्ता के मुंह से कोई बात निकली है तो इसके पीछे कोई न कोई प्रयोजन तो होगा ही। किसी भी व्यक्ति अथवा समुदाय का सम्मान करना बहुत ही अच्छी बात है परन्तु उसकी भी कुछ सीमायें होती हैं और यदि सम्मान उस सीमा को पार कर जाता है तो उसकी संज्ञा बदलकर चापलूसी हो जाती है। वैसे तो 'चापलूसी' आज की गन्दी होती राजनीति में पूर्णतया सक्रिय और सफल है परन्तु राजनीति को स्वच्छ एवं परिवर्तित करने आये लोगों द्वारा इस तरह के परिवर्तन के संकेत अशोभनीय हैं।
Thursday, April 3, 2014
Wednesday, April 2, 2014
'स्वयं' के ऊपर बदलेगी परम्परागत 'राजनीति'
'राजनीति' किसी भी राज्य की नीतियों की अभिव्यक्ति है। पिछले कुछ दिनों से देश में चुनावी माहौल का असर है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाय तो भारतवर्ष में 'चुनाव' हर पाँच वर्ष में आने वाले महोत्सव कि तरह हो गए हैं। जिस तरह देश के परम्परागत त्योहारों में लोगो के लिये बाज़ार में आकर्षक योजनाएं आती हैं उसी तरह चुनाव में राजनैतिक पार्टियाँ भी लुभावने वादे ले कर आती हैं। पिछले दिनों हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव दिलचस्प थे। जिसमे राजनैतिक परिवर्तन, भ्रष्टाचार मुक्त भारत और 'स्वराज' जैसे उच्चादर्शों को लेकर आयी 'आम आदमी पार्टी' ने कई वर्षों से चली आ रही परंपरागत राजनीति के मानचित्र को बदलने का एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। परन्तु जिन उच्चादर्शों की बात यह पार्टी कर रही है क्या इस तरह कि नीतियों को समाज में क्रियान्वित करने की नैतिक ज़िम्मेदारी सिर्फ नेताओं की है ? और यदि है तो समाज के लोगों की उसमे क्या भागेदारी है और यदि नहीं है तो समाज के लोगों की क्या ज़िम्मेदारी है ? इस तरह के प्रश्नों का ज़वाब इस देश की जनता को 'स्वयं' से मांगना होगा। किसी भी शासन व्यवस्था में जनता को एकजुट होकर अपनी जागरूकता दिखानी पड़ेगी। शासन व्यवस्था को सुव्यवस्था की तरफ पोषित करना पड़ेगा। वास्तविकता यह है कि किसी भी आदर्शनीति को समाज में क्रियान्वित करने की नैतिक ज़िम्मेदारी समाज के लोगों को उठानी पड़ेगी। जनता की सिर्फ वोट के एक दिन की भागीदारी सिर्फ और सिर्फ एक राजनैतिक नेता या पार्टी का उदय करती है परन्तु एक जागरूक एवं सामाजिक रूप से सक्रिय जनता न सिर्फ राजनीति को निरंतर स्वच्छ रखती है अपितु एक आदर्श व्यवस्था का निर्माण भी करती है।किसी भी सामाजिक कार्य में लिप्त लोगो को इस बात को समझना ज़रूरी है कि जब हम किसी भी सामाजिक कार्य का हिस्सा बनते हैं तो उस कार्य की सफलता अथवा असफलता को 'स्वयं' की सफलता अथवा असफलता से जोड़ लेते हैं। उस स्तिथि में लोभ अथवा अभिमान जैसी भावनायें 'स्वयं' से जुड़ती हैं और 'स्वयं' को सामाजिक रूप से निष्क्रिय अथवा भ्रष्ट कर देती हैं। यदि यही सफलतायें एवं असफलतायें अगर 'स्वयं' से न जुड़कर 'समाज' से जुड़ती हैं तो ये हमको सदैव सामाजिक उन्नति के लिये अग्रसर करती हैं। ये सिद्धांत समाज के हर वर्ग में लागू होने चाहिये चाहे वो किसी भी पार्टी के राजनेता हों, पदाधिकारी हो, कार्यकर्ता हो अथवा आम नागरिक। जब हम सब एक साथ 'स्वयं' के ऊपर आयेंगे तब ही बदलेगी परपम्परागत 'राजनीति' अन्यथा सिर्फ़ सरकारें बदलेंगी।
कैसे कहूँ 'मैं हूँ आम आदमी'
राजनीति शब्द ने तो बहुत पहले से ही आम जनता के मन में भय पैदा कर रखा था। समाज में अधिकतर सभ्य लोग स्वयं को राजनैतिक सम्बोधन से दूर रख कर, आम आदमी की श्रेणी में ही रहना तथा सम्बोधित होना पसन्द करते थे। परन्तु ये राजनीति भी क्या चीज़ है इसने देश की जनता से यह अधिकार भी छीन लिया। पहले मैं बात बात में कहता था कि भाई मैं तो आम आदमी हूँ परन्तु अब भय इस बात से लगता है कि यह शब्द बोलने पर लोग मुझे किसी पार्टी विशेष का कार्यकर्ता, प्रचारक अथवा राजनैतिक न समझ लें। एक दिन की घटना बताता हूँ, एक दुकान के बाहर, मैं अपने मित्र से किसी विषय पर चर्चा कर रहा था और इस बात से पूरी तरह से बेफ़िक्र था कि कोई हमारी बातें भी सुन रहा है। चर्चा के दौरान मैंने वही परम्परागत पंक्ति का प्रयोग किया कि भाई 'मैं हूँ आम आदमी' तभी पीछे से एक आवाज़ आयी--अंकल अगर आप 'आम आदमी' हैं तो आपकी 'टोपी' कहाँ है ? मुझे लगा किसी ने मेरा मज़ाक उड़ाया, मैं पीछे मुड़ा और देखा कि एक छोटा सा बच्चा खड़ा था। उसकी आँखों में बहुत ही संवेदनशीलता थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसने उसके मन में उठे किसी गम्भीर प्रश्न का उत्तर माँगा। उसने मेरा मज़ाक नहीं उड़ाया था क्योंकि जब मैंने उसकी तरफ़ देखा तो फिर से वो बच्चा प्रश्नवाचक अंदाज़ में बोला -- आम आदमी तो टोपी पहनते हैं न ? मेरे पास उसके प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। मैं उस बच्चे से कैसे कहता कि आज तक आम आदमी 'टोपी' ही पहनता आया है बस अन्तर इतना है कि हर बार यह दिखती नहीं थी इस बार दिखने लगी है। अचानक उस बच्चे की माँ आयी और बच्चे का हाथ पकड़ कर ले जाने लगी और मुझसे बोलीं भाई साहब ये बहुत बोलता है। मैं मुस्कराया और मन ही मन यह सोचा कि हम इस पीढ़ी को क्या दे रहे हैं ? राजनीति ने तो ऐसी विकट स्तिथि पैदा कर दी है कि आम आदमी की परिभाषा ही बदल गयी है। एक ऐसी ही घटना हमारे नवविवाहित बंगाली मित्र के साथ हुयी। एक दिन शाम को वो अपनी धर्म-पत्नी के साथ बैठे चाय पी रहे थे तभी उनकी किसी महिला मित्र का फ़ोन आया और उन्होंने पूछा कि आपको कौन सी पार्टी पसन्द है ? इन्होंने इधर से उत्तर दिया -- मुझे तो 'आप' बहुत पसन्द है। फिर क्या था इधर इनकी पत्नी को लगा कि ये किसी महिला से कह रहे हैं कि मुझे आप बहुत पसंद हैं। आज तक वो बेचारे इस घटना पर गहरा अफ़सोस जताते हैं। 'आम आदमी' एवं 'आप' जैसे शब्द तथा 'झाड़ू' जैसा चुनाव चिन्ह समाज के लगभग हर वर्ग द्वारा बहुत अधिक उपयोग किया जाता है और शायद इसीलिए देश के एक नए राजनैतिक दल ने इन सबको अपना कॉपी राइट बना लिया है। जिससे वह अधिक से अधिक लोगों के संवाद तथा प्रतिदिन के कार्य में रहकर अपना प्रभाव कायम रख सके। वैसे जो भी हो इतने सारे उपसर्गों को एक साथ किसी राजनैतिक प्रयोजन के लिये संयोजित करना बहुत ही बुद्धिमत्ता का काम है। फिलहाल ये बातें तो सुनने में बहुत ही मजेदार हैं परन्तु एक गम्भीर विषय यह भी है कि भारतीय समाज में सबसे अधिक उपयोग में आने वाले शब्दों में भी राजनैतिक पार्टी ने कब्ज़ा ज़मा लिया है। अब अगर भविष्य मैं ये पार्टी भी अन्य पार्टीयों की तरह भ्रष्ट हो गयी तो फिर हमारी चेतना में निश्चित ही एक प्रश्न आएगा कि कैसे कहूं -- मैं हूँ आम आदमी ?
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