Wednesday, April 2, 2014

'स्वयं' के ऊपर बदलेगी परम्परागत 'राजनीति'

'राजनीति' किसी भी राज्य की नीतियों की अभिव्यक्ति है। पिछले कुछ दिनों से देश में चुनावी माहौल का असर है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाय तो भारतवर्ष में 'चुनाव' हर पाँच वर्ष में आने वाले महोत्सव कि तरह हो गए हैं। जिस तरह देश के परम्परागत त्योहारों में लोगो के लिये बाज़ार में आकर्षक योजनाएं आती हैं उसी तरह चुनाव में राजनैतिक पार्टियाँ भी लुभावने वादे ले कर आती हैं। पिछले दिनों हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव  दिलचस्प थे। जिसमे राजनैतिक परिवर्तन, भ्रष्टाचार मुक्त भारत और 'स्वराज' जैसे  उच्चादर्शों को लेकर आयी 'आम आदमी पार्टी' ने कई वर्षों से चली आ रही परंपरागत राजनीति के मानचित्र को बदलने का एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। परन्तु जिन उच्चादर्शों की बात यह पार्टी कर रही है क्या इस तरह कि नीतियों को समाज में क्रियान्वित करने की नैतिक ज़िम्मेदारी सिर्फ नेताओं की है ? और यदि है तो समाज के लोगों की उसमे क्या भागेदारी है और यदि नहीं है तो समाज के लोगों की क्या ज़िम्मेदारी है ? इस तरह के प्रश्नों का ज़वाब इस देश की जनता को 'स्वयं' से मांगना होगा। किसी भी शासन व्यवस्था में जनता को एकजुट होकर अपनी जागरूकता दिखानी पड़ेगी। शासन व्यवस्था को सुव्यवस्था की तरफ पोषित करना पड़ेगा। वास्तविकता यह है कि किसी भी आदर्शनीति को समाज में क्रियान्वित करने की नैतिक ज़िम्मेदारी समाज के लोगों को उठानी पड़ेगी। जनता की सिर्फ वोट के एक दिन की भागीदारी सिर्फ और सिर्फ एक राजनैतिक नेता या पार्टी का उदय करती है परन्तु एक जागरूक एवं सामाजिक रूप से सक्रिय जनता न सिर्फ राजनीति को निरंतर स्वच्छ रखती है अपितु एक आदर्श व्यवस्था का निर्माण भी करती है।किसी भी सामाजिक कार्य में लिप्त लोगो को इस बात को समझना ज़रूरी है कि जब हम किसी भी सामाजिक कार्य का हिस्सा बनते हैं तो उस कार्य की सफलता अथवा असफलता को 'स्वयं' की सफलता अथवा असफलता से जोड़ लेते हैं। उस स्तिथि में लोभ अथवा अभिमान जैसी भावनायें 'स्वयं' से जुड़ती हैं और 'स्वयं' को सामाजिक रूप से निष्क्रिय अथवा भ्रष्ट कर देती हैं। यदि यही सफलतायें एवं असफलतायें अगर 'स्वयं' से न जुड़कर 'समाज' से जुड़ती हैं तो ये हमको सदैव सामाजिक उन्नति के लिये अग्रसर करती हैं। ये सिद्धांत समाज के हर वर्ग में लागू होने चाहिये चाहे वो किसी भी पार्टी के राजनेता हों, पदाधिकारी हो, कार्यकर्ता हो अथवा आम नागरिक। जब हम सब एक साथ 'स्वयं' के ऊपर आयेंगे तब ही बदलेगी परपम्परागत 'राजनीति' अन्यथा सिर्फ़ सरकारें बदलेंगी। 

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