Wednesday, April 2, 2014

कैसे कहूँ 'मैं हूँ आम आदमी'




राजनीति शब्द ने तो बहुत पहले से ही आम जनता के मन में भय पैदा कर रखा था।  समाज में अधिकतर सभ्य लोग स्वयं को राजनैतिक सम्बोधन से दूर रख कर, आम आदमी की श्रेणी में ही रहना तथा सम्बोधित होना पसन्द करते थे। परन्तु ये राजनीति भी क्या चीज़ है इसने देश की जनता से यह अधिकार भी छीन लिया। पहले मैं बात बात में कहता था कि भाई मैं तो आम आदमी हूँ परन्तु अब भय इस बात से लगता है कि यह शब्द बोलने पर लोग मुझे किसी पार्टी विशेष का कार्यकर्ता, प्रचारक अथवा राजनैतिक  समझ लें। एक दिन की घटना बताता हूँ, एक दुकान के बाहर, मैं अपने मित्र से किसी विषय पर चर्चा कर रहा था और इस बात से पूरी तरह से बेफ़िक्र था कि कोई हमारी बातें भी सुन रहा है। चर्चा के दौरान मैंने वही परम्परागत पंक्ति का प्रयोग किया कि भाई 'मैं हूँ आम आदमी' तभी पीछे से एक आवाज़ आयी--अंकल अगर आप 'आम आदमी' हैं तो आपकी 'टोपी' कहाँ है ? मुझे लगा किसी ने मेरा मज़ाक उड़ायामैं पीछे मुड़ा और देखा कि एक छोटा सा बच्चा खड़ा था। उसकी आँखों में बहुत ही संवेदनशीलता थी और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसने उसके मन में उठे किसी गम्भीर प्रश्न का उत्तर माँगा। उसने मेरा मज़ाक नहीं उड़ाया था क्योंकि जब मैंने उसकी तरफ़ देखा तो फिर से वो बच्चा प्रश्नवाचक अंदाज़ में बोला -- आम आदमी तो टोपी पहनते हैं ? मेरे पास उसके प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। मैं उस बच्चे से कैसे कहता कि आज तक आम आदमी 'टोपी' ही पहनता आया है बस अन्तर इतना है कि हर बार यह दिखती नहीं थी इस बार दिखने लगी है। अचानक उस बच्चे की माँ आयी और बच्चे का हाथ पकड़ कर ले जाने लगी और मुझसे बोलीं भाई साहब ये बहुत बोलता है। मैं मुस्कराया और मन ही मन यह सोचा कि हम इस पीढ़ी को क्या दे रहे हैं ? राजनीति ने तो ऐसी विकट स्तिथि पैदा कर दी है कि आम आदमी की परिभाषा ही बदल गयी है। एक ऐसी ही घटना हमारे नवविवाहित बंगाली मित्र के साथ हुयी। एक दिन शाम को वो अपनी धर्म-पत्नी के साथ बैठे चाय पी रहे थे तभी उनकी किसी महिला मित्र का फ़ोन आया और उन्होंने पूछा कि आपको कौन सी पार्टी पसन्द है ? इन्होंने इधर से उत्तर दिया -- मुझे तो 'आपबहुत पसन्द है। फिर क्या था इधर इनकी पत्नी को लगा कि ये किसी महिला से कह रहे हैं कि मुझे आप बहुत पसंद हैं। आज तक वो बेचारे इस घटना पर गहरा अफ़सोस जताते हैं। 'आम आदमी' एवं 'आप' जैसे शब्द तथा 'झाड़ू' जैसा चुनाव चिन्ह समाज के लगभग हर वर्ग द्वारा बहुत अधिक उपयोग किया जाता है और शायद इसीलिए देश के एक नए राजनैतिक दल ने इन सबको अपना कॉपी राइट बना लिया है। जिससे वह अधिक से अधिक लोगों के संवाद तथा प्रतिदिन के कार्य में रहकर अपना प्रभाव कायम रख सके। वैसे जो भी हो इतने सारे उपसर्गों को एक साथ किसी राजनैतिक प्रयोजन के लिये संयोजित करना बहुत ही बुद्धिमत्ता का काम है। फिलहाल ये बातें तो सुनने में बहुत ही मजेदार हैं परन्तु एक गम्भीर विषय यह भी है कि भारतीय समाज में सबसे अधिक उपयोग में आने वाले शब्दों में भी राजनैतिक पार्टी ने कब्ज़ा ज़मा लिया है। अब अगर भविष्य मैं ये पार्टी भी अन्य पार्टीयों की तरह भ्रष्ट हो गयी तो फिर हमारी चेतना में निश्चित ही एक प्रश्न आएगा कि कैसे कहूं -- मैं हूँ आम आदमी

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