Thursday, April 3, 2014

कैसा परिवर्तन 'योगेन्द्र' या 'सलीम'


चुनाव के दौरान मुस्लिम समुदाय का समर्थन प्राप्त करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते। यहाँ तो हद ही पार हो गयी। ऐसा लगा कि निकट भविष्य में किसी भी समुदाय विशेष का समर्थन प्राप्त करने के लिए लोग अपनी पहचान भी बदलने को तैयार हैं। दिनांक १ अप्रैल २०१४ को दैनिक भास्कर के नई दिल्ली राष्ट्रीय संस्करण के चौथे पृष्ठ में प्रकाशित इस समाचार को पढ़ कर मुझे बहुत हँसी आयी और थोड़ा कष्ट भी हुआ। राजनीती शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान श्री योगेन्द्र यादव जी के विषय में यह पढ़ना अत्यंत ही हास्यास्पद था कि उन्होंने किसी जनसभा में स्वयं का नाम 'सलीम' और अपनी बहन का नाम 'नज़मा' बता डाला। पहले भी लोगों के नाम के साथ किसी उपाधि स्वरुप कई संज्ञाओं को सुना है परन्तु मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए अपना नाम ही बदल लेना यह बात तो हज़म होने लायक नहीं है। अब इनके जैसे प्रखर वक्ता के मुंह से कोई बात निकली है तो इसके पीछे कोई न कोई प्रयोजन तो होगा ही। किसी भी व्यक्ति अथवा समुदाय का सम्मान करना बहुत ही अच्छी बात है परन्तु उसकी भी कुछ सीमायें होती हैं और यदि सम्मान उस सीमा को पार कर जाता है तो उसकी संज्ञा बदलकर चापलूसी हो जाती है। वैसे तो 'चापलूसी' आज की गन्दी होती राजनीति में पूर्णतया सक्रिय और सफल है परन्तु राजनीति को स्वच्छ एवं परिवर्तित करने आये लोगों द्वारा इस तरह के परिवर्तन के संकेत अशोभनीय हैं।  

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